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बुत के माथे चढे़ फूल मुरझा गये- मनोरमा सिंह

Monday, November 9, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

मनोरमा सिंह

आजमगढ़ 

फिर तो बेहतर, अभी भूल जाऊँ तुम्हें

पास में आश भी खाश कुछ न रही......

हो मुकम्मल, तुम्हारी हर - इक दास्ताँ

न अब वो किस्सा रहा न कहानी रही.....

बुत के माथे चढे़ फूल मुरझा गये

दानिशीं न रही, फरिश्तगी न रही.......

लौटकर के वही तीर आये इधर

तीरगी में फंसे,औʼ धार भी न रही......

गम के गुलफाम कितने मिले राह में

न वो खुशबू रही, न सिफ़त ही रही......

रंग, खुशबू, फिजा में भटकते रहे 

रात फूलों की बारात लुटती रही.......

लौट चल ऐ दिल-ए-बेसबर अब यहाँ 

न वो जलवा रहा, न वो चिलमन रही


तीरगी‌|  अंधेरा

सिफ़त| विशेषता या गुण

गुलफाम| फूलों के जैसा

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