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वो नारंगी सा सूरज - रंजना डीन

Tuesday, December 22, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रंजना डीन, लखनऊ


रोज़ शाम 

मैं और वो नारंगी सा सूरज 

बढ़ते हैं एक दूसरे की ओर 

जैसे जैसे घटती है हमारे बीच की दूरी 

वैसे वैसे वो भी उतरने लगता है ऊंचाइयों से 


कुछ दूर चलने के बाद 

यूँ लगता है जैसे 

अब वो मिल जायेगा मुझे 

किसी नदी के किनारे सुस्ताता हुआ..... 


पर वो छोर आने से पहले 

आ जाता है मेरा घर 

और मैं चल पड़ती हूँ 

इस नारंगी सूरज का मोह छोड़कर 

उस नन्ही सी चाँदनी की ओर 

जो बिखरी रहती हैं 

मेरी बेटी की मासूम मुस्कान में 

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