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अन्न दाता का धरा पर मान होना चाहिए - सोनल उमाकांत बादल

Thursday, December 10, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

सोनल उमाकांत बादल 

फ़रीदाबाद

जो भरते हैं पेट सभी का उनकी भी 

भूख़ का निदान होना चाहिए 

ये अनुरोध है मेरा आप सभी से 

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए 


कहानी एक किसान की बयां करती हूँ मैं तुमको 

के इक उम्मीद ले निकला था फ़सल उगाने की 

खेत में हरियाली लाने की जल्दी जी जिनको 

करो भगवान का शुक्रिया दिया सबकुछ जिसने तुमको 

ज़रा पूछों उनके दिलसे के इक रोटी भी नहीं जिनको 

नंगे पैरों जोतकर खेत पड़गए पांओ में छाले हैं 

चटखती धूप में जिनके पड़गए चेहरे काले हैं 

वो निकलता है भूखा घरसे भगाते जिनको हो दर से 

उनका भी अपना तो कोई सम्मान होना चाहिए 

ये मेरा अनुरोध है आप सभी से के 

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए!


नस्ट होजाती है फ़सल उनकी मूसलाधार पानी जब बरसे 

सरकती पांओ तले की ज़मीन छिन जाती है छत भी सरसे 

जो दुनिया का है पेट भरता वो पाई पाई को तरसे 

तोड़ देता है अंत में दम क़र्ज़ का ब्याज़ भरते - भरते 

कोई खा लेता है ज़हर तो कोई तो फांसी पर झूले 

खाकर ब्याज़ किसानों का कैसे सरकारें फलें फूलें 

पैदा ही अन्न नहीं जो होगा फांकोगे क्या दो जून धूलें 

किसी किसान की मेहनत कभी भी हम नहीं भूलें 

चाहती हूँ मैं के किसान का माफ़ लगान होना चाहिए 

ये अनुरोध है मेरा आप सभी से के 

अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए! 


कितने भी संकट आएं पर फ़सल उगाने तत्पर अड़ता 

धूप जलाक अांधी तूफ़ांन किसी का उसे न फर्क पड़ता 

खेतोँ की करने रखवाली रात दिन उसका शरीर गलता 

भूखे पेट भी खेतोँ मैं उसके लगातार है हल चलता 

कठिन परिश्रम करने पर उसे फ़सल का फल मिलता 

देख हरियाली खेतोँ की ख़ुशी से चेहरा है ख़िलता 

लहलहाती हो फ़सल किसानों की के इतना धान हो 

गूंज उठे जयकारों से मेरा किसान महान हो 

जो भरते हैँ पेट सबका उनकी भी भूख़ का निदान हो 

ये अनुरोध है मेरा आप सभी से के 

अन्नदाता का धरा पर मान हो 

अन्नदाता का धरा पर मान हो!

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