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"रंगे हाथ" /लघुकथा - पुष्पा कुमारी "पुष्प"

Tuesday, December 8, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 पुष्पा कुमारी "पुष्प" 

   पुणे (महाराष्ट्र)

"क्या जमाना आ गया है! आजकल पुरुष भी प्रताड़ित हो रहे हैं।" अभी कुछ देर पहले अपने थाने में आया एक मामला देख इंस्पेक्टर साहब एफ आई आर की कॉपी मिलाते मुंशी से चर्चा करने लगे।

"कोई नया मामला थोड़े ही है साहब! पुरुष भी शुरू से प्रताड़ित होते रहे हैं भले ही मामला संज्ञान में अब आ रहा है।"

"फिर भी महिला प्रताड़ना की तुलना में यह अभी भी गौण है।"

इंस्पेक्टर साहब अपने अब तक के कार्यकाल में दर्ज हुए मामलों के आधार पर कह गए। मुंशी अभी कुछ कहता उससे पहले ही इंस्पेक्टर साहब के टेबल पर रखा लैंडलाइन फोन घन-घना उठा। इंस्पेक्टर साहब ने रिसीवर उठा लिया 

"हेलो!"

"आपका मोबाइल बिजी क्यों आ रहा है?"

"नहीं! बिजी कहां है? हमारे पैकेट में ही है।"

"झूठ मत बोलिए! मैं कब से फोन लगा रही हूं और आप कहीं और बतिया रहे हैं। कम से कम नंबर तो डिस्प्ले हुआ होगा? लेकिन नहीं! उससे बतियाने में रस जो आ रहा होगा।"

सफाई देने का कोई मौका दिए बिना पत्नी सुनाए जा रही थी और इंस्पेक्टर साहब ऑफिस में होने का लिहाज कर चुपचाप सुने जा रहे थे।

"मैं फोन करता हूं मोबाइल से। ठीक है!"

उनके चेहरे की रंगत उड़ चुकी थी। मुंशी भी एफ आई आर की कॉपी मिलाता लगातार कनखियों से साहब की ओर देख उनके चेहरे के अचानक बदलते रंगत को समझने की कोशिश करता रहा।

रिसीवर रख इंस्पेक्टर साहब जेब से मोबाइल निकाल नेटवर्क चेक कर अपनी झेंप मिटा फिर से रौब में आने की कोशिश करते हुए बोले 

"हाँ! तो मुंशी क्या कह रहे थे?"

"सर! हम कह रहे थे कि पुरुष भी प्रताड़ित होते हैं लेकिन महिलाओं की तरह वह सबको बताते नहीं हैं।"  #रंगे_हाथ पकड़े गए इंस्पेक्टर साहब आगे कुछ बोल नहीं पाए।


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