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जो बोया है वही काटना है - पूजा खत्री

Thursday, December 31, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 

पूजा खत्री, लखनऊ
इंडेविन न्यूज़ नेटवर्क


साई इतना दीजिये, जामै कुटुंब समाय। 

मैं भी भूखा न रहूं,अतिथि न भूखा जाए।।

                                           कबीरा

सभी धर्म ग्रंथों में पवित्रता और ईमानदारी पर प्रकाश डाला गया है  पर कैसी पवित्रता और कैसी ईमानदारी ..?

हम मनुष्य तो स्वयं को वैसे भी सब जीवों से उच्च मानते हैं पूजा पाठ कर्म काण्ड गंगा स्नान सब कुछ तो करते हैं फिर हम अपवित्र कहां ..? पर यहां कर्म सिद्धांत मजबूत है जो हमारे रोज के संकल्पों से बंधा है जैसे गुरबाणी में स्पष्ट लिखा है 

         भरीऐ हरु पैरु तनु देह।। पाणी धोतै उतरसु खेह।।
         मूत प्रीती कपडु होय।। दे साबूणु लईएओहु धोइ।।
         भरीऐ मति पापा के संगि।।ओहु धौपे नावै के रंगि।।

         शारीरिक गंदगी और वस्त्रों को तो साबुन से धुला जा सकता है पर मन की गंदगी  ( छल- कपट बेईमानी हवस आदि इंद्रिय दोषों) को केवल परमात्मा के शरणागत हो कर ही धुला जा सकता है। अपनी कथनी और करनी को एक सा रखकर उनके शरणागत हुआ जा सकता है ,वो ही स्वीकार्य है,वो ही निदान है,वो ही पवित्रता है अपने जमीर की अपने आप से।।

         ये सिद्धांत कैसे काम करता है मानो एक बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।

सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी।

        दोपहर का समय था । सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए । थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा। साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।

साधु बाबा आराम करने लगे खीर थोड़ी हजम हुई । साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ?

              साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली। शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे.?

                नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा । और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है।" साधुः "यह दयालुता नहीं है । मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।

             तब साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" 

सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी।साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 

'हे राम.... यह क्या हो गया ?

मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया ।"इसीलिए कहा गया,

जैसा आहार वैसा व्यवहार

जैसा संग वैसा रंग

              ये कर्म भूमि है। जो बोया है वहीं काटना है। बोया हुआ हर बीज, संकल्प जन्म लेगा पर कहां, किस रुप में,किस जन्म में कोई नहीं जानता इसलिए निष्काम कर्म को महत्व दिया गया। भाव रखकर किये हुआ हर कर्म का भुगतान लेने या देने के लिए आना होगा  इस कर्म भूमि पर,किसी भी रुप में किसी भी योनि में। 

आखिर चौरासी लाख योनियों का आंकड़ा यूं ही दर्ज नहीं है इतिहासों में और मुक्ति के प्रयास में सैकड़ों सालों से चली आ रही भक्तों की कोशिशें,पर मुक्ति का साधन इतना सहज सुलभ नहीं। मन को मारना और खुदी को पाना एक जंग है खुद से खुद के लिए, क्यूंकि हर चमकती चीज लुभाती है, मोह माया (दुनियावी पदार्थ) की ओर ले जाता है तब मुक्ति की बात सोचे कौन , आज को भरपूर जीया जाए कल किसने देखा,ये धारणा मन को फिर से बांध लेती है इस चलायमान दुनिया से।

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