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सिंदूरी पलाश - अनुपमा पांडेय "भारतीय

Friday, December 4, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

अनुपमा पांडेय "भारतीय ( गाजियाबाद )

तरु की ऊंची फुनगी पर,

चिनगी- सा खिल उठा पलाश,

तेरे आवन का  संदेश जैसे,

महक उठा मन का आकाश।


प्रमुदित है, भू - अंबर ,

स्नेह शिक्त, अभी शीक्त मधुमास,

लिए अधरों पर अंगार ,

सुलग रहा ,सिंदूरी पलाश।


कंचन काया झुलस रही,

प्रेम अगन में यौवन,

तरुनाई सी इठलाई,

चंचल क्यों  है चितवन?।


विरहन  मन में चिनगी-सी ,

कैसी ये हूक कौंध गई,

अलकावली बीच उभरी छवि,

पलकन गीली कर गई।


सिंदूरी नभ घन क्यों कर,

रह रह  मन भरमाए,

खिले फूल पलाश के,

पर,अब भी तुम न आए...

अब भी तुम न आए।

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