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कुसंग से बचिए - जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज

Sunday, December 6, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज

सत्संगी सत्संगी के घर में जाते हैं। जाने दो लेकिन उनसे कह दो भई देखो हमारे पास आओ तो केवल राधाकृष्ण और गुरु की चर्चा ही करो, तब तो आओ और अगर तुमने कहा वो बड़ा मक्कार है, वो बड़ी मक्कार है, वह बड़ा वैसा है, ये सब करना है तो भाई नमस्ते। हमारे यहाँ मत आओ, साफ जवाब, भले ही वो फील करे और पचास गाली दे के जाय कि तुम्हारे घर कदम न रखेंगे।

बड़ा अच्छा हुआ आपने प्रतिज्ञा कर लिया, हमारा कल्याण हो गया। अब आप मत आइये हमारे घर, हम भर पाये आपसे।

होता ये है कि सत्संग भी होता है आप लोग एक दूसरे के घर जाते हैं तो कुछ देर तो अच्छी अच्छी बातें करते हैं, कुछ कीर्तन भी किया उसके बाद बैठे अरे भई उसके यहाँ हाँ मैंने सुना है ऐसा हाँ ये सब क्या होने लगा? ये क्या कमाने लगे तुम अभी तो तुम हरि गुण गा रहे थे और अब ये तुम परदोष चिंतन निन्दा ये सब क्या? ये कहाँ किस चक्कर में पड़ गये? तुम सर्वज्ञ हो गये हो, किसी के अंतःकरण को तुम जान भी नहीं सकते हो, फिर तुम कैसे कहते हो अमुक साधक खराब है। तुमको सबको अपने से अच्छा मानना चाहिये।

तो अधिक सम्पर्क भी किसी साधक को साधक से नहीं रखना चाहिये।

संसार का व्यवहार संसार के ढंग से रखना चाहिये। लेकिन जब संपर्क हो तो सत्संग का ही संपर्क हो। जब कोई किसी से मिले तो भगवद्विषय का विषय हो तभी मिलें, तभी बात उसकी आपस में हो और उसके आगे बात करना वो चाहे, अच्छा भई अब तो ऐसा है कि मैं अब जा रहा हूँ, मुझे बहुत जरूरी काम है। फिर भी न माने अगर वो तो भई देखो ऐसा है कि हम लोग सत्संग की दृष्टि से एक दूसरे से मिलते हैं तो ये सब बातें तो हम लोग जीवन में बहुत कर चुके वो खराब है, वो खराब है, वो खराब है हम अच्छे हैं। हमको इसको छोड़ना है अब तो ये सोचना है। 

'मो सम कौन कुटिल खल कामी।'

और सब अच्छे हैं मैं ही खराब हूँ। अब तो इसका चिन्तन करना है।

अब हम लोगों का मार्ग आध्यात्मिक है जब हम को सही गार्जियन मिल गया है, उसने मार्ग बता दिया है तो अपना सर्वनाश जानबूझ कर हम लोग क्यों करें? और फिर अगर न कमायें तो कम से कम गँवावें तो न। अरे भई कोई आदमी नहीं कमाता है तो कम से कम खर्च तो न करे। नुकसान तो न करें हम, प्लस न करें और माइनस करते जायें या प्लस एक करें और माइनस दो करें तो फिर क्या होगा? और फिर कुसंग बहुत जल्दी हावी हो जाता है, सत्संग देर में हावी होता है। क्यों कि कुसंग में हमारी प्रवृत्ति अनादिकाल से है। बहुत जल्दी हम उस तरफ बढ़ जाते हैं। झूठ-मूठ को एक आदमी ने एक आदमी से जाकर सत्संगी ने सत्संगी से कहा सुना तुमने क्या, वह सत्संगी है न। हाँ। उसका वो सामान चुरा ले गया। अच्छा। बदमाश है। बाद में वो खबर मिली अरे वो गप्प झोंक रहा था। अरे तो दिमाग तो खराब कर लिया तुमने बाद में खबर लगेगी। अरे सत्संगी क्या सब मायिक जीव तो हैं। इतनी सफेद झूठ बोलते हैं, इसी में बैठे हुये बहुत से लोग हमारा नाम ले लेकर के महाराज जी ने कहा है तुम्हारे लिये कि वह बड़ा खराब आदमी है। अरे महाराज जी ने तो कहा नहीं। मैंने कब कहा था ऐसे अगर दोनों पेश भी हुये तो इतना झूठ बोल जायेगा। मैंने कब कहा था कि महाराज जी ने कहा है। तो ये संसारी जीव हैं इनका बहुत पुराना अभ्यास है, कुछ लोगों का यही धन्धा है अपना। एक सत्संगी के घर पर गये, उसके घर गये वहाँ बुराई किया वहाँ बुराई किया। कुछ हमको रुपया दे दीजिये, कुछ कोई स्वार्थ किसी का कोई स्वार्थ, तो ये सब चीजें आप लोग व्यवहार जगत् की कायदे कानून से कीजिये कि किसी को सत्संगी न मान लीजिये कि वो सत्संगी है। अरे वो कुसंगी भी है। मायिक जीव है उससे सावधान रहिये। अपना केवल भगवद् विषय तक का नाता रखिये और वहीं तक सम्बन्ध रखिये उसके आगे न बढ़िये। तो इस प्रकार सत्संगियों के कुसंग से भी बचिये और बाहर के कुसंग से भी यथाशक्ति बचिये।

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