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"मुर्गा भात"/ लघुकथा - पुष्पा कुमारी "पुष्प"

Monday, December 7, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पुष्पा कुमारी "पुष्प"

  पुणे (महाराष्ट्र)

"मेरे आगे-पीछे घूमकर, प्यार जताकर दिनभर में मुट्ठी भर अनाज तो यही खा जाता है!"

सूप भर चावल ले बाहर आ थोड़ा सा चावल अपने प्यारे कुटु के आगे बिखेर ध्यान से सूप में उंगलियां फिराती वह वहीं अपने झोपड़ी की देहरी पर बैठ गई। 

झोपड़ी के बाहर आंगन में बैठ अपनी धुंधली आंखों पर जोर दे दूसरे सूप में रखे चावल से कंकड़ साफ करता उसका पति उन दोनों का आपस में प्यार देख, उसकी बातें सुन मुस्कुराया। 

उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। अपने आंगन में पलने वाले मुर्गा-मुर्गी, बकरे-बकरियों से ही वह वृद्ध दंपति प्यार जता लेते।

"अबकी बार जब वृद्धा पेंशन का कागज बनाने वाले साहब गांव में आएंगे तो मुखिया से कह कर इसके पेंशन की बात भी कर लेना।" 

वह अपनी पोपली आवाज में पति से मजाक कर गई लेकिन उसकी यह बात सुन उसके पति के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

"सरकारी पेंशन मिलना इतना आसान थोड़े ही है।"

"कल जो साहब आए थे वह बहुत अच्छे थे!" उसने थोड़ी उम्मीद जताई।

"हम्म। साहब तो अच्छे थे।" उसके पति ने गहरी सांस ली।

"उन्होंने मेरे कुटू का हाल-चाल भी पूछा था! है ना कुटू?" वह अपने उस देसी मुर्गे से बतियाती प्यार जताती रही।

"हाँ। साहब को महीन चावल और कुटू जैसा देसी मुर्गा अच्छा लगता है।" नन्हे-नन्हे कदमों से अपने करीब आ चुके कुटू के सामने चुटकी भर चावल उसके पति ने भी अपने सूप से निकालकर रख दिया।

"लेकिन उनकी पसंद तुमको कैसे मालूम?" पहली बार शहर से उस पिछड़े गांव का जायजा लेने आए साहब की पसंद-नापसंद की बात अपने पति के मुंह से सुनकर उसे आश्चर्य हुआ।

"वापस जाते वक्त गाड़ी में बैठने से पहले साहब बोले थे।"

"क्या बोले थे साहब?" 

"तुम्हारे कूटू को उनके क्वार्टर पर पहुंचाने को।" 

"क्या!! कुट्ट्.. उसे ऐसा लगा जैसे उसके गले में कुछ फंस गया और दिल में एक जोरदार दर्द सा उठा। 

"तुम चिंता मत करो! मुखिया जानते हैं कि तुम अपने कुटू से कितना प्यार करती हो इसलिए उन्होंने बात संभाल लिया था।" वह अपने पति का मुंह ताकती रही कुछ बोली नहीं लेकिन उसका पति उसे समझाने लगा 

"साहब को तो देसी मुर्गा से मतलब है! मुखिया ने उनके क्वार्टर पर एक देसी मुर्गा भिजवाने का वादा कर दिया है।"

"आज तक मुखिया को हम बहुत खराब आदमी समझते थे लेकिन हम गलत थे। मुखिया बहुत अच्छा आदमी है।" अपने प्यारे कुटू के आगे थोड़ा और चावल बिखेरती वह धीरे से बोली।

"असल में मुखिया को इस बार पूरा उम्मीद है।" 

"किस बात का उम्मीद?"

"यही कि इस बार गांव के सारे बूढ़ा-बूढ़ी का वृद्धा पेंशन का कागज बन जाएगा।"

"इससे मुखिया को क्या फायदा होगा? उसका तो अभी वृद्धा पेंसिल लायक उम्र भी नहीं हुआ है।" उसे कुछ समझ नहीं आया।

"कुटू का जान बचाने के बदले में मुखिया हर महीने हमारे वृद्धा पेंशन के आठ सौ रूपयों में से दो सौ रूपए अपने पास रखेगा।"

"यह तो बेईमानी है!" अपने पति की समझ और मुखिया की चालाकी पर उसे क्रोध आने लगा।

"बेईमानी कहां! जान का कीमत है।"

"अरे! तुम बेवकूफ हो क्या? दो सौ रूपए में इससे बड़ा मुर्गा आ जाएगा! देसी मुर्गा! और पता नहीं कब तक ये यहां अनाज खाता रहेगा और हम मुखिया को हर महीने दो सौ रूपए चुकाते रहेंगे।" 

पत्नी की नाराजगी देख उसका पति चुप रहा और पलभर में ही हर तरफ से अपने पति को नफा-नुकसान समझा चावल से भरा सूप रखने के लिए वह फुर्ती से उठकर झोपड़ी के भीतर चली गई और फिर बाहर आकर उसने अपने पति से पूछा

"तुम साहब का क्वार्टर देखे हो क्या?" 

"हां। क्वाटर तो मैंने देखा है।"

"चलो मेरे साथ हम साहब से मुखिया का शिकायत करेंगे।" 

झोपड़ी का दरवाजा बाहर से बंद करते हुए उसने अपने पैरों में चप्पल पहन लिए।

"लेकिन".. 

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं! इस मुर्गा का दोनों पैर बांधकर जल्दी से एक झोला में डालकर ले चलो। हमें साहब को #मुर्गा_भात के लिए और ज्यादा इंतजार नहीं करवाना चाहिए।"

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