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चेकनामा - कवि धर्मराज

Tuesday, December 8, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रचनाकार - धर्मराज ( लखनऊ)

आज लखनऊ अपने घर पे था थोड़े पैसों की जरूरत थी तो सुपुत्र जी को ए टी एम कार्ड दे दिया कि चले जाओ ए टी एम से पैसे निकाल लाओ ।आधे घण्टे के बाद वो आये और बोले कि आपका एटीएम खराब है पैसे नही निकल पा रहे हैं ।वैसे मैने कल सीतापुर में भी एटीएम से पैसे निकालने की कोशिश की थी तब भी पैसे नही निकले थे तो मैने सोंचा था शायद मशीन खराब है ।लेकिन अब मुझे इत्मीनान हो गया की मशीन नही मेरा एटीएम कार्ड ही खराब है ।

      पैसे की जरूरत बहुत सख़्त थी अब बैंक से निकलवाने के अलावा कोई और चारा न था ।मैने अपनी चेकबुक निकाली कसम से मुझे ऐसी फीलिंग आई जैसे मैं कोई करोड़पति टाइप का आदमी हूँ। एटीएम तो की भी प्रयोग कर सकता है लेकिन चेकबुक का प्रयोग सिर्फ बड़े लोग ही करते हैं मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ । मैने  अपने सुपुत्र के नाम से चेक काट दिया ऐसा नही है कि मैं उसे रुपये देने वाला था हमारे खानदान में लड़कों को बस जूता देने का रिवाज़ चला आ रहा है ।मेरे बाबू जी को अपनी खानदानी परंपरा से बहुत प्यार था इस लिए वो मुझे जब तब जुतियाते रहते थे ।मैं भी अपने इसी परम्परा को आगे बढ़ाना चाहता था लेकिन रागदरबारी के छोटे पहलवान की तरह कंही लड़का रिटर्न गिफ़्ट न दे दे इस लिए मैं अहिंसा का पुजारी बनकर उससे पेश आता हूँ ।लेकिन पैसे मैं उसे वैसे भी नही देने वाला था ।

    अब आप कहेंगे पैसे देने नही थे तो उसके नाम का चेक क्यों काटा मैने वो इस लिए की मैं बाहर खड़ा रहूँगा और वो बैंक से पैसे निकलवा के मुझे दे देगा ।

       दोनो लोग तैयार होकर बैंक के लिए निकल पड़े ।भिठौली चौराहा स्थित स्टेटबैंक के बाहर मैने गाड़ी खड़ी की और मेरा लड़का वीर अभिमन्यु की तरह बैंक के ब्युह में घुस गया ।काफी देर हो गई जब वो बाहर नही निकला तो मैने कहा चल के देखता हूँ ।अब यार बैंक के गेट पर कोई जयद्रथ तो बैठा नही था जो मुझे रोकता मैं भी अंदर घुस गया ।अंदर देखा तो मेरा लड़का लाइन में सबसे आगे लगा था उसके पीछे भी दस बारह लोग खड़े थे ।मैने पूँछा क्या हुआ तो काउन्टर की ओर इशारा करके बोला मैडम अंदर ऑफिस में गई हैं ।मैने कहा आफिस के भी अंदर ऑफिस ये बैंक भी प्याज के छिलके  जैसा है जितना अंदर जाओ परत बढ़ती रहती है। मैं ग्राहकों के लिए लगी कुर्सियों पर बैठ गया इंतजार करने लगा थोड़ी देर में लड़का आया बोला मैडम पैसे नही दे रही हैं ।

     मैने कहा चलो मालूम करता हूँ तब तक एक महाशय जिन्हें पैसा जमा करना था उनका पैसा मैडम काउंटिंग कर रही थी काउंटिंग मशीन से ।पैसे से पूरा बैग भरा था समय लगना भी लाजमी था ।

           जब उनका काम हो गया तो मैने पूँछा की मैडम इस चेक पर पैसे क्यों नही दे रही ?

    वो बोली कि जिस शाखा में खाता है आपका वंही से इसका भुगतान होगा दूसरे को अगर देना चाहेंगे ।

  मैने कहा ऐसा तो शायद नियम नही है मेरे चेक में भी लिखा है कि पूरे भारत में स्टेटबैंक की किसी भी शाखा में इसे भुनाया जा सकता है ।

    मैने हिंदी फिल्में देखी है उसमें हेरोइन का बाप हीरो की ओर चेकबुक फेंक कर कहता है मेरी बेटी को भूल जाओ जितनी चाहे रकम भर लेना ।वो ये कभी नही कहता कि पैसे बैंक के फला शाखा से निकाल लेना ।

मैं कोई कड़ी बात कहने जा रहा था तभी घरवाली की याद आ गयी और मेरा सारा जोश ये सोंच कर  ठंडा हो गया कि अगर ये भी उन्ही की तरह लड़ाकू निकली तो क्या होगा फिर ।

    अब मैने मैडम से विनय किया कि पैसे कैसे निकलेंगे वो बोली आप अपने नाम से चेक काटो निकाल दूंगी ।

   भैया मरता क्या न करता अपने नाम से चेक काटी तब मुझे पेमेंट मिला ।

    

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