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"विद्यार्थी" - पुष्पा कुमारी "पुष्प"

Wednesday, December 9, 2020

/ by Dr Pradeep Dwivedi

पुष्पा कुमारी "पुष्प" 

  पुणे (महाराष्ट्र)

दरवाजे की घंटी बजाने की जरूरत नहीं पड़ी उसके इंतजार में दरवाजा पहले से ही खुला था और हल्की सी दस्तक देते ही

"निरज! आओ भाई! वेलकम इन पुणे।" 

सुभाष भैया अपने फ्लैट के कमरे से बाहर आ उसे गले लगा भीतर ले आए।

इतनी गर्मजोशी के साथ हुए स्वागत से वह गदगद हुआ लेकिन भीतर प्रवेश करते ही भयभीत! सुभाष भैया को मिलाकर पाँच लोग पहले से ही उस कमरे में मौजूद थे और अब वह खुद छठा अभी-अभी पहुंचा था।

खैर यह नजारा देख उसने पल भर में ही सोच लिया कि थोड़ी देर वहां बैठकर वापस स्टेशन के पास वाले उसी लॉज में चला जाएगा जहां कल रात ठहरा था। लेकिन सुकून से रात काटने के लिए वहां के इंचार्ज से एक कमरा मांगना भी तो अब उसकी खुद की बेज्जती ही होगी जिसके लॉज की व्यवस्था को सुबह थर्ड क्लास बता चाबी थमा आया था। 

आज ऑफिस पहुंचकर उसने यहां कई वर्षों से पुणे में अकेले रहकर नौकरी करने वाले अपने गाँव के ही जान-पहचान वाले सुभाष भैया का नम्बर जुगाड़ कर उन्हें अपनी समस्या बता किसी बढ़िया और थोड़ा सस्ता लॉज का पता मांगाने के लिए फोन लगाया था और वह सुखद आश्चर्य से भर उठा जब भैया बिना एक पल गंवाए बिल्कुल उसके अपने बड़े भाई की तरह बोले थे कि 

"चिंता क्यों करते हो? रात में सोना ही तो है! जब तक तुम अपने रहने लायक मकान नहीं ढूंढ लेते और तुम्हारा परिवार यहां रहने नहीं आ जाता तुम मेरे साथ मेरे कमरे पर ही रह लेना।" उन्होंने अपने फ्लैट का पता भी उसे व्हाट्सएप से ऐड कर उसी वक्त भेज दिया था।

लेकिन यहां उनके छोटे से वन बीएचके फ्लैट के कमरे में इतने लोगों का जमवाड़ा देख उसे अपने कंधे से बैग उतारना भी बेवजह ही लगा। 

"लगता है थक गए हो! ऑफिस में काम ज्यादा था क्या?"

अपने हाथों से उसके कंधे से बैग उतारते हुए उन्होंने उसे गुसलखाना का रास्ता दिखाया।

"जाओ फ्रेश हो जाओ! चाय बनाते हैं, फिर जल्दी से खाना बनाने की तैयारी करेंगे। आज तुमसे रात भर बतियाना भी तो है।" 

उनके चेहरे पर वही बचपन वाली गवंई शरारत तैर गई। वह भी मुस्कुराया। 

गुसलखाने की ओर बोझिल कदमों से जाते वक्त उसने कनखियों से देखा चार लोग एक लैपटॉप पर मक्खी की तरह झुके थे। 

"जरूर कोई खास सीन चल रहा होगा।" खैर ना चाहते हुए भी वह गुसलखाने के भीतर प्रवेश कर गया। 

भीतर का नजारा गजब का था। साफ-सुथरा एकदम चकाचक! मन खुश हो गया उसका। सुबह लॉज के कबाड़ जैसे वॉशरूम में वह ठीक से नहा नहीं पाया था।

"भैया! हम स्नान कर लेते हैं।" 

वह तेजी से बाहर आकर अपने बैग से तौलिया ले वापस गुसलखाने में लगे झरने के नीचे वही रखा शैंपू-बॉडी वॉश लगा खूब नहा एकदम फ्रेश होकर बाहर आया। बाहर कमरे में एकदम सन्नाटा था और अचानक इतना एकांत देख वह घबरा गया।

"भैया! सुभाष भैया।" 

"क्या हुआ भाई?" भैया उस कमरे के बाहर वाले दरवाजे से भीतर आए।

"यार! हम डर गए थे! कहां चले गए सब लोग?" 

"उन लोगों ने सोचा कि तुम ऑफिस से थक कर आए हो इसलिए वह सब अपने फ्लैट पर चले गए और हम उन सबको बाहर तक छोड़ने गए थे।" एक अजनबी की अनकही भावनाओं के प्रति उन लोगों की इतनी समझ देख वह अपने पहले की सोच पर खुद से शर्मिंदा हुआ लेकिन उसके मनोदशा से अनभिज्ञ भैया बताने लगे। 

"ये लोग नया जॉइनिंग हैं। मेरे पास इनके मदद लायक कुछ सॉफ्टवेयर पड़ा था वही डाउनलोड करने बुला लिए थे।" वह आकंठ आत्मग्लानि से भरा सुनता रहा, भैया की दरियादिली पर हुंकारी तक नहीं भर पाया।

उधर भैया किचन में जाकर चाय बनाने लगे और वह भी इधर तौलिया छोड़ टी-शर्ट और बरमूडा पहन रसोई में ही आ गया। 

"भैया। हम भी कुछ मदद करे!"

"हां भाई! मदद तो करनी ही पड़ेगी। जिंदगी एक दूसरे की मदद से ही तो चलती है।" उसकी ओर चाय की प्याली बढ़ाते हुए भैया मुस्कुराए और वह किसी गुरुकुल में प्रवेश पाए एक नए #विद्यार्थी की तरह टकटकी बांधे भैया को देखता रहा।


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