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कृषि का औद्योगीकरण किसानो एवं देश हित के लिये घातक -अर्जुन पांडेय

Sunday, February 21, 2021

/ by Indevin Times

हरिकेश यादव-संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)

अमेठी। 

फोटो -डॉo अर्जुन पांडेय व उनके साथी
० न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम0एस0पी0) पर कानून बनाया जाय 

० निजीकरण के क्षेत्र में भन्डारण को बन्द किया जाय आवश्यक वस्तु अधिनियम के अन्तर्गत किसानों के उत्पादन को बरकरार रखा जाय

० नये कृषि बिल पूूंजीवादी चिन्हित कार्पोरेट घरानों को लाभ देने वाला 

भारत कृषि प्रधान देश है।कृषि कानूनों के अस्तित्व में आने से कराह रही कृषक व्यवस्था पूरी तरह से गर्त में चली जायेगी जिसे बचाने के लिए कोई अवतार नही लेगा।जिसे बचाने के लिये सभी राजनीतिक दलों को लोगो व समस्त क्षेत्रवासियों को आगे आने की जरूरत है।

कृषि कानूनों के दुरुपयोग को रेखांकित करते हुए डॉक्टर अर्जुन पांडेय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत गांवों का देश है जिसकी मूलभूत इकाई कृषि है। देश की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी इसी पर अपना जीवन निर्वाह करती है। देश का किसान और मजदूर सरकार के नये कृषि बिल को लेकर कराह रहा है। मजबूर किसान आन्दोलन की राह पर खड़ा है। आन्दोलन के लगभग तीन माह बीत जाने के बावजूद मामला सुलझ नही पाया। सरकार एवं किसान के बीच इस बिल को लेकर पहले बात चीत का दौर चला फिर भी सरकार किसानो को प्रताड़ित कर रही है। किसान को आतंकवादी, आन्दोलनजीवी और परजीवी कहा जा रहा है। देश को गुमराह करने के लिये सरकार से जुड़े किसान संगठनो का सम्मेलन किया जाना किसानो के आन्दोलन पर मजाक है। अभी तक 150 से अधिक किसान अपनी जान गंवा चुके हंै। सैकड़ोें किसान देश द्रोह के मुकदमें में जेल में हैं। किसानो का आन्दोलन सरकार की गले की हड्डी बना हुआ है। देश के कोने कोने में किसानो की महा पंचायतें हो रही है। 26 जनवरी को लाल किले की घटना साजिश का एक अंग है। किसानो एवं मजदरों की ऐसी प्रताड़ना अंग्रेजी हुकूमत में भी नही हुई होगी। गुजरात में मुख्यमंत्री पद पर रहते 2011 में मोदी जी अध्यक्षता में एम0एस0पी0 पर कानून बनाने की मुहिम मनमोहन सिंह की सरकार में की गयी थी आज मोदी सरकार द्वारा इस नये कृषि बिल द्वारा किसानो के हितों को नजर अन्दाज किया जाना घोर चिन्ता का विषय है। 

देश में सीलिंग एक्ट लागू है। देश में अधिकतर लघु एवं सीमान्त कृषक जिनके पास 1.7 एकड़ से कम भूमि है। ऐसे में ठेका कृषि सर्वथा असंभव है। तीनों नये कृषि बिल मौलिक अधिकारों के विरूद्ध है। शुरूआती दौर में कृषि को राज्य सरकारों के अधीन रख गया। 1954 में केन्द्र सरकार को भी इसमें शामिल किया गया। यह कानूून किसानों-मजदूरों के सामने पंूूजीवादी, कुछ खरब पतियों कुछ गिने चुने कार्पोरेट घरानों को खड़ा करने वाला है। यह कानूून पंूजीपतियों को विदेशी कम्पनियों की तरह मनमानी से लूूटने का अवसर प्रदान कर रही है। आज सरकार व्यापारियों को फायदे देने के लिये अड़ी है। आज किसानो का आन्दोलन एक बडा मुद्दा है। आज देश में गांधी जैसा नेतृत्व नही है। बापू जी ने नील की खेती के विरूद्ध बिहार के चम्पारण में किसानो को अपने पैर पर खड़ा होने के लिये चेतना जगाने का कार्य किया था। किसानांे को अपना हक बचाने तथा ग्राम स्वराज हेतु गांधी जी के बताये रास्ते पर चलने की जरूरत है जैसे अंग्रेजी हुकूूमत के विरूद्ध गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन, सत्याग्रह एवं असहयोग आन्दोलन चलाया था जो निर्विवाद रूप में अहिंसक था। किसान आन्दोलन भी उसी तरह से चल रहा है। इसे ऐसे ही चलाने की जरूरत है। रेल रोको आन्दोलन में इसकी छलक दिखाई पडी है। ऐसे आन्दोलन की बदौलत ही सत्ता के अड़ियल रूख को नरम किया जा सकता है। व्यापारियों की लूट किसानो के सिर पर है। नये कृषि बिल कम्पनी राज लाने वाले बिल हैं। वे दिन दूूर नही कि किसान कार्पोरेट घरानो का गुलाम बन जायेगा। नये कृषि बिल के कारण कृषक अपने की खेत में कृषक मजदूर बनकर रह जायेगा। आवश्यकता इस बात की है कृषक मजदूूर महिलायें अहिंसक तरीके से आन्दोलन का रास्ता अपनाये। एक न एक दिन सरकार को अपना नया कृषि बिल वापस लेने के लिये मजबूर होना पडे़गा।

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