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समाज, संस्कृति की पहचान होगी, तभी मातृभाषा अपनायेगे-डां धन्ञजय सिंह

Monday, February 22, 2021

/ by Editor

हरिकेश यादव-संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)

अमेठी।   

०अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष आलेख 

प्रोफेसर डॉ धन्ञजय सिंह 

जाने माने समाज शास्त्री एवं प्रोफेसर डॉ धन्ञजय सिंह ने कहा कि आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को मनाते इक्कीस साल हो गए ।बंग्लादेश के लोगों की अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण ने मातृभाषा दिवस जैसी संकल्पना को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । 21 फरवरी 1952 को ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों एंव सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का कड़ा विरोध किया ।यह  विरोध प्रदर्शन इतना तीव्र था कि इसको रोकने के लिए पाकिस्तान सरकार को गोली चलानी पड़ी, जिसमें अनेक विद्यार्थी अपनी  मातृभाषा के लिए बलिदान हो गये। पाकिस्तान सरकार ने बाध्य होकर 29 फरवरी 1956 को बंग्ला भाषा को अधिकारिक भाषा का दर्जा देना पड़ा। बंग्लादेश में 1952 से ही 21फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में  मनाया जाता है । बंग्लादेश में मातृभाषा के लिए शहीदों की स्मृति में यूनेस्को द्वारा 17 नवम्बर 1999 को 21फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाने का निर्णय लिया । वर्ष 2000 से प्रति वर्ष 21 फरवरी को अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है । इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में भाषाई एंव सास्कृतिक विविधता और बहुभाषिता का प्रसार करना है। यूनेस्को ने वर्ष 2021का थीम 'समावेशी शिक्षा और समाज के लिए बहुभाषिता को प्रोत्साहन' विषय रखा है । यह इस अवधारणा पर आधारित है कि एक समावेशी  समाज बनाने के लिए बहुभाषिता आवश्यक है । वैश्वीकरण के दौर में भारतीयों के लिए मातृभाषा दिवस का विशेष महत्व है। सांस्कृतिक और भाषाई विविधता भारतीय सभ्यता और संस्कृति का आधार रही है। भारतीय परम्परा,मूल्य,आदर्श,मर्यादाएं,आंकाक्षाएं,जीवन एंव साहित्य की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही सम्भव है । वैश्वीकरण के दौर में  मीडिया और बाजार ने अनेक स्थानिय भाषाओ पर अस्तित्व के समक्ष  संकट उत्पन्न कर दिया है । दुनिया के कई विकसित एंव विकासशील देशों ने मातृभाषा को आधार बनाकर विकास के नये कीर्तिमान स्थापित किया है ,जापान एंव चीन इसके सर्वोत्तम उदाहरण है ।मातृभाषा को आधार बनाकर विश्व बाजार में चीन एंव जापान एक आर्थिक एंव औद्योगिक  महाशक्ति बन चुके हैं ।आज विश्व में लगभग 6900 भाषाएं बोली जाती है,जिसमें से अगले चालीस वर्षों बाद चार हजार से अधिक भाषाओं के लुप्त होने की सम्भावना है । भारत में सबसे अधिक 1652 भाषाएं बोली जाती है ।भारत में 1365 से अधिक बोलियाँ है,जो देश की समृद्ध भाषाई विरासत पर गर्व करने लायक है । हमारे देश में भाषाई विविधता को लेकर कहावत है कि ' कोस  कोस पर पानी बदले चार  कोस पर वानी' । लेकिन आज अनेक बोलियाँ लुप्त हो रही है,जो चिन्ताजनक है ।भारत में दस भाषाएं ऐसी है जिसके जानकार आज सौ से कम लोग बचे हैं ,इन भाषाओं में ज्यादातर भाषाएं मूल निवासियों द्वारा बोली जाती है ।वहीं इक्कासी (81) भारतीय भाषाओं की स्थिति  अत्यंत दयनीय है,जिसमें मणिपुर ,बोडो,गढवाली,लद्दाख,मिजो,शेरपा और स्मिति शामिल है ।दुनिया की खतरे में पड़ी भाषाओं के यूनेस्को के आन-लाइन चेप्टर के अनुसार भारत की 197 भाषाएं ऐसी है ,जो असुरक्षित या विलुप्त हो चुकी है । विलुप्त हो रही भाषाओं में हिमालयन बेल्ट में बोली जाने वाली अहोम, एंडो,रंगकास,सेंगमई,तोलचा आदि सम्मलित है। इनके संरक्षण के लिए संगठित प्रयास की जरूरत है ।भाषा ही संस्कृति की संवाहक होती है अगर स्थानीय  भाषा समाप्त होगा तो स्थानीय  संस्कृति भी सुरक्षित एंव संरक्षित नहीं रहेंगी । यूनेस्को के अनुसार विश्व की 97 प्रतिशत लोग मात्र चार प्रतिशत भाषाओ की जानकारी रखते हैं ,जबकि दुनिया के तीन प्रतिशत लोग बाकी के शेष 96 प्रतिशत भाषाओ की जानकारी रखते हैं । आज दुनिया में अनेक मूल निवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर है ।      

नई शिक्षा नीति 2020 के तहत शैक्षणिक सत्र 2021 से स्कूलों में कक्षा पांच तक अनिवार्य रूप से  मातृ भाषा में शिक्षाे देने की बात कही गई है,अगर राज्य चाहें तो आठवीं कक्षा  तक  की पढाई  मातृ भाषा में करवा सकेंगे । इसके अतिरिक्त आज अनेक  आई आई टी एंव एन आई टी भी मातृभाषा में बी टेक की पढाई करा रहे हैं ।भारत सरकार मेडिकल की पढाई भी मातृभाषा में करवाने की तैयारी कर रही है । केन्द्रीय बजट 2021 में भारतीय भाषाओ को विलुप्त होने से बचाने के लिए देश के कई शहरों में संरक्षण एंव अनुवाद केन्द्र बनाने का निर्णय लिया है ।इन केन्द्रो पर देश के मुख्य 22  भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त स्थानीय एंव विलुप्त होती भाषाओं पर शोध एंव पहचान दिलाने पर कार्य होगा ।  मातृभाषा की महत्ता को बताते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल । बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटत न हिय को  सूल । पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने कहा कि  मैं अच्छा वैज्ञानिक इस लिए बन सका क्योंकि मैंने गणित एंव विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में  प्राप्त की थी। वैश्वीकरण के दौर में आज कोई भी देश , समाज,संस्कृति अपनी  वैश्विक पहचान तभी स्थापित कर पायेगा, जब वह मातृभाषा को अपनायेगा।

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