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प्रकृति आपदा एवं मां गंगा के गुस्से का जिम्मेदार है स्वयं मानव -डॉक्टर अर्जुन पांडेय

Tuesday, February 9, 2021

/ by Indevin Times

हरिकेश यादव -संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)

अमेठी।

०अन्य स्थानों पर प्राकृतिक आपदा व प्रलय की संभावना

o डैम से तबाह हो रहा उत्तराखण्ड, नेपाल से सटे बिहार के पुरलिया झील पर भी मड़रा रहा है खतरा

o अन्धी नासमझी विकास योजना के कारण पहाड़ों पर मड़रा रहे संकट के बादल

o यदि यह तबाह दिन के बजाय रात मंे हुई होती तो क्या होता?

o गंगा पुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द की बात यदि मान ली गयी होती तो इस कहर से बच जाते

उत्तराखण्ड में ग्लेशियर के फटने से हुए विनाश का अन्दाज लगाया जाना मुश्किल है। जो शीमठ चमोली में ऋषिगंगा-धौलीगंगा पर बने हाईड्रो प्रोजेक्ट का बांध टूूटने से आज देश को भयंकर त्रासदी से गुजरना पड़ रहा है। गंगापुत्र प्रोफे0 जी0डी0 अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द गंगा नदी के किनारे बनाये जा रहे बांधो के निर्माण को लेकर काफी समय तक अनशन करते हुए अन्त में अपना बलिदान कर दिये। उनकी मांग थी कि गंगा भागीरथी, मन्दाकिनी, अलखनन्दा पर सभी निर्माण एवं प्रस्तावित बांधो पर की रोक लगा दी जाय। यदि उनकी बात भारत सरकार द्वारा मान ली गयी होती तो शायद उत्तराखण्ड की इस त्रासदी से बचा जा सकता था। 

प्रकृति के कहर से तपोवन के ऋषिगंगा, धौलीगंगा के बांध बह गये। प्रकृति एवं मां गंगा के इस गुस्से का जिम्मेदार स्वयं मानव है। यदि यह तबाही दिन के बजाय रात में हुई होती तो क्या होता ? भारत सरकार पूंजीपतियो एवं विदेशी कम्पनियों को लाभ देने की नीयति से इन बाधों का निर्माण करा रही है जो उत्तराखण्ड के साथ समूचे उत्तर भारत को खतरे में डालने का काम है। जून 2013 में केदार घाटी में चार हजार से ज्यादा लोग जान गवां चुके हैं। तपोवन के रांणी गांव के पास हिमखण्ड के फटने से नदियों का जल स्तर बढने से बांध बह गये टनल मौत की सुरंग बन गये। आस पास के लोग इस त्रासदी से भयभीत है। चमोली के त्रिशूल एवं नन्दाफूटी शिला समुद्र के नीचे छेद हो चुका है जो निरन्तर बढ रहा हैं। वहां कभी भी ग्लेशियर फट सकता है। यदि भारत सरकार ने अलखनन्दा, मन्दाकिनी एवं भागीरथी पर बनाये जा रहे बांधों पर रोक न लगाई तो देश का मुकुट कहे जाने वाले हिमालय का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमानियों का द्रवण बढ़ गया है। इसे नजरदांज नही किया जा सकता।

कुछ समय तक घटना पटल पर रहती है किन्तु समय के साथ घुंधली होकर नेपथ्य में चली जाती है। सुन्दर लाल बहुगुणा ने चिपको अन्दोलन की शुरूआत इसी रांणी गांव से की थी। समय समय पर भूगर्भ एवं पर्यावरणविद् इस खतरे से आगाह करते रहते है फिर भी सरकार की अन्धी एवं नासमझी विकास योजना के कारण पहाडों पर संकट के बादल मड़रा रहा हैं। पहाड़ो पर प्रकृति के साथ छेड़ छाड़ जीवन के लिए घातक है। सरकार प्रकृति को चुनौती देने से बचे। चार घाम को जोड़ने की परियोजना के तहत पहाड़ो पर बनने जा रही चैड़ी सड़कों और उनके किनारे बसने वाली बस्तियों के कारण भूूकम्प प्रभावित कमजोर भूखण्ड वाले पहाड़ों की दशा क्या होगी? पहाडों के साथ मां गंगा को बचाने हेतु तरूण भारत संघ के जलपुरूष राजेन्द्र सिंह, मातृसदन के स्वामी शिवानन्द, स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द, रमेश शर्मा, भूवैज्ञानिक डा0 खड़गसिंह वाल्दिया, तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना को सचेतन करने वाले माटू संगठन के विमल भाई पाने अरूण तिवारी, मां गंगा की बेटी बिहार की साध्वी पद्मावती के साथ देश के गंगा भक्त राज एवं समाज को जगाने का कार्य कर रहे हैं। गंगा को बचाने के लिए स्वामी ज्ञानस्वरूप सान्नद अपना बलिदान कर चुके हैं। देश में हो रही त्रासदियों से बचने के लिए राज, समाज एवं सन्त को आगे आने की जरूरत है। जब मां गंगा बचेगी तभी देश बचेगा।

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