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(कविता) मेरी खता - डॉ मंजू डागर चौधरी

Wednesday, March 10, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi
डॉ मंजू डागर चौधरी
अंतराष्ट्रीय पत्रकार आयरलैंड


वो पल जो तुझसे जुड़ा था ,

हर लम्हा मेरी खता था ,

इश्क से बने अफ़सानों में ,

हर तरफ बस तेरा पता था। 


दिल के हर झरोखें में ,

एक चेहरा तेरा बसा था ,

तुम भी वही ,

हम भी वही ,

कुछ बिखरे हुए मोती ,

बस हर तरफ पड़े थे ।


मेरी जुल्फों में उलझी थी ,

तेरी सब उलझने , 

 फिर भी न जाने तुम  ,

क्यों लापता थे। 


वो पल जो तुझसे जुड़ा था ,

हर लम्हा मेरी खता था। 

सांसों में महकती सांसे तुम्हारी ,

नजरों में बहकती नजरें तुम्हारी ,

बस उसी एक पल में ,

धरती और आकाश का मिलन था। 


वो पल जो तुझसे जुड़ा था ,

हर लम्हा मेरी खता था ,

इश्क से बने अफ़सानों में ,

हर तरफ बस तेरा पता था।

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