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आई ओपनर - संजू वर्मा

Sunday, March 7, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi
संजू वर्मा
जमशेदपुर, झारखंड


अनल प्रताप सिंह तीन दिन से बाहर गए हुए थे। पत्नी मीरा सिंह ने बहुत पूछा अचानक कानपुर क्यों जा रहे हैं  ?पर उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया ।बस इतना कहा कुछ जरूरी काम है उसे निपटा कर आता हूं, फिर सब कुछ बताऊंगा।"ये तीन दिन बड़ी बेचैनी बीते।

       आज घर वापस आए तो उनके हाथों में एक मोटी फाइल थी।पत्नी मीरा सिंह आश्चर्य भरी नजरों से देखती हुई पूछीं -"आपके हाथ में ये क्या है?"

सिंह जी-"मेरी जिम्मेदारी है।"

मीरा जी -"मतलब?"

सिंह जी -"बताता हूँ।पहले सभी बच्चों को बुला लीजिए।और हाँ उससे पहले ये मिठाई का डब्बा लीजिए और सबका मुँह मीठा कराइये।"

    मीरा सिंह ने सबको आवाज दी और  कुछ ही देर में घर के सभी सदस्य हॉल में एकत्रित हो गए। सभी ने मिठाई खाई, पर नजर सब की फाइल पर थी।तभी सिंह जी ने कहा "बच्चों ! मैंने अपनी जायदाद का बंटवारा कर दिया है । जब तक हम जीवित हैं तब तक सारी जायदाद हमारी है और हमारी मृत्यु के बाद मेरी चल अचल संपत्ति मेरे तीनों बेटों को बराबर- बराबर मिलेगी। मैंने वसीयत बना दी है।"

     बेटे -बहुओं के मुंह पर रौनक छा गया।सभी के मन मेंजिज्ञासा होने लगी कि उनके हिस्से में क्या मिला है?

      छोटी बहू के मन में कुछ और चल रहा था उसने अपने ससुर जी से कहा-" क्षमा कीजिएगा बाबूजी इस बटवारे में कुछ छूट रहा है। आप अपनी एक संतान को भूल रहे हैं। नेहा जिज्जी आप की एकमात्र पुत्री हैं। इसलिए उन्हें भी आप की जायदाद में हिस्सा मिलना चाहिए। " सभी का दिमाग घूम गया कि ये क्या फालतू की बात कर रही है। दोनों बहुएं आग्नेय नेत्रों से छोटी बहू को देखने लगीं।खुसुर फुसुर शुरू हो गया, तभी सिंह जी ने कहा-" बेटियों को जायदाद में हिस्सा नहीं मिलता! बहू तुम बेकार की बातें मत करो।"

बहू-" माफ कीजिएगा बाबूजी मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूँ। ऐसी ही सोच के कारण हमारे समाज में औरतों की स्थिति सुधर नहीं रही है। आपके लिए चारों बच्चे समान होने चाहिए। यदि आप ही अपनी पुत्री को अपनी जायदाद में हिस्सा नहीं देंगे,बेटा-बेटी में भेद करेंगे ,उनके साथ न्याय नहीं करेंगे तो उनके ससुराल वालों से आप क्या उम्मीद रखते हैं कि इनके साथ वे न्याय करें ।उनको अधिकार दें।"

मीरा जी -"क्या बात करती हो बहू कहीं बेटियाँ भीअपने मायके में हिस्सा लेती हैं ?उन्हें तो मायके का सिर्फ प्यार और दुलार ही चाहिए होता है।" क्यों स्नेहा शदियों से चलती आई रिवाज तोड़कर भाइयों के बराबर हिस्सा लोगी क्या?"

नेहा ने कहा -"नहीं माँ मुझे इस घर में आप सभी का प्यार मिल जाए ,जिससे मैं ससुराल में होने वाली दिक्कतों का सामना कर सकूं यही काफी है।"

बहू-" यह आपका बड़प्पन है जिज्जी ।यह घर जितना हम सभी का है उतना आपका भी । आप बराबर की हकदार हैं।" स्नेहा आश्चर्य से छोटी बहू को देख रही थी।

तभी बड़ी बहू ने कहा -"अब क्या तुम अपनी पढ़ाई का रौब यहाँ भी झाड़ोगी ,छोटी हो छोटी की तरह रहो बड़ो की बातों में टांग अड़ाना जरूरी है क्या ?

   मँझली बहु  भी तुनकती हुई बोली तुम क्यों जिज्जी को उकसा रही हो?"

मीरा जीने देखा घर का माहौल खराब हो रहा है इसलिए छोटी बहू से बोली -" हां छोटी बहू तुम किस तरह की बातें ले कर बैठ गई ।ये सब मेरे घर में नहीं चलेगा ।मुझे भी नहीं मिला है अपने मायके में हिस्सा!किसी लड़की को नहीं मिलता ये सब बेकार की बातें हैं ।"  तभी सिंह जी फाइल उठाकर बोले -"तुम सही कह रही हो छोटी बहू !मैं ही पिता होने का फर्ज चुकाने में चूक कर रहा था।भूल गया था कि कि मेरे तीन नहीं चार बच्चे हैं और चारो मेरे कलेजे के टुकड़े हैं,मुझे इनमें भेदभाव नहीं करना चाहिए था, पर अभी भी देर नहीं हुई।मैं आज ही अपनी गलती में सुधार करवाऊंगा।" कहते हुए फाइल लेकर घर से बाहर निकल  पड़े।

घर के सभी लोगों का मुंह फुल कर कुप्पा हो गया । धीरे-धीरे सभी उठकर वहां से चले गए। स्नेहा वहीं बैठी सोचती रही -"मैं कितनी गलत थी ।हमेशा दोनों भाभियों का साथ देती रही और छोटी भाभी की ऊंची शिक्षा का मजाक उड़ाती रही।उसके उचित तर्क को उसका अहंकार समझती रही। उसे हमेशा छोटी सोच वाली समझती रही ,जबकि छोटी सोच तो मेरी थी ।भाभी उम्र में मुझसे भले छोटी है ,पर सोच में बहुत बड़ी है।"

मीरा जी ने छोटी बहू से कहा  "सच कहती हो बेटा!कभी -कभी छोटे भी आई ओपनर होते हैं।"कहते हुए गले से लगा ली।

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