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पत्रकारिता की छवि को धूमिल करते ये नकली पत्रकार - निखिलेश मिश्रा

Tuesday, May 18, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

इंडेविन न्यूज नेटवर्क


निखिलेश मिश्रा, लखनऊ

कानपुर में पत्रकारों की स्थिति भी लखनऊ के खानदानी डॉक्टर साहब जैसी प्रतीत होती है। समझ नही आता कि कौन असली वाले, कौन एकदम असली वाले, कौन प्राचीन और पुराने वाले। सबके अपने अपने नक्कालों से सावधान के बोर्ड लगे हैं। जिला प्रशासन के लिए भी असली और नकली पहचान पाना मुश्किल है। 

कोई संगठन पत्रकार हित की बात कह कर संगठन बनाया गया है कोई DAVP के लिए बनाया गया है, कोई मुफ्त सुविधाएं दिलाने के लिए बनाया गया है तो कोई मुआवजा दिलाने के लिए बनाया गया है। लगभग सब अपने अपने एजेंडे के लिए आंदोलन करने के लिए रजिस्टर्ड है।

समस्या केवल तब आती है जब किसी घटना में आरोपी शातिर और हिस्ट्रीशीटर निकलता है और उसके पास से बरामद आई कार्ड पर अंकित संस्थान उससे पल्ला झाड़ लेता है। मुश्किल तब भी सामने आती है जब रिक्शे वाला, खेमचे वाला, पान वाला और टेम्पो वाला भी सिपाही को अपने वरिष्ठ पत्रकार होने के सबूत देने के लिए अपना आई कार्ड निकाल कर दिखा देता है।

वास्तविक पत्रकारों की आपसी एकता में इन फर्जी वालो की मधुरता इस कदर अंदर तक घुसी होती है कि ये भी पत्रकार एकता का एक अभिन्न भाग बनकर लटके रहते हैं। परिणामतः एकता जिंदाबाद के नाम पर दुनियां भर की दलाली और जरायम से अपनी कमाई करते हैं तथा प्रशासन पर अनावश्यक दबाव डालकर मनचाहा काम कराने का प्रयास करते हैं। बदनाम वास्तविक यानी असली वाले पत्रकार होते हैं।

इसका नतीजा यह होता है कि जो सिपाही या चौकी इंचार्ज इनकी बात नही मानता है उसके खिलाफ खबरे बनाकर आपस मे कॉपी पेस्ट करते हैं और असली पत्रकारों से मधुरता और एकता जिंदाबाद के लाभ लेकर धड़ाधड़ खबर फैलाते हुए वह टीवी और नेशनल मीडिया तक पंहुचा देते हैं। प्रशासन की छवि को धूल चटा देते हैं।

यहां ज़रा सी सख्ती करने पर समस्या केवल एक यह आती है कि इन्हें टच करने पर एकता जिंदाबाद इनपर सख्ती करने के आड़े आ जाती है और असली वाले पत्रकार इनकी मधुरता के फर्जी झाम में फंसकर बीच बचाव में उतर आते हैं। कई निर्दोष इनके अनावश्यक दबाव में जेल चले गए बाद में पोलिस को जवाब देते नही बना। यह एक बड़ी समस्या है जिसे वास्तविक पत्रकारों को समझने की जरूरत है।

मुख्य समस्या है वास्तविक पत्रकारों की भीड़ में से कचरा सफाई की। अन्यथा वास्तविक पत्रकारों की छवि तो धूमिल होगी ही साथ मे जिला प्रशासन भी अनावश्यक दबाव में रहकर काम नही कर सकेगा।

बेहतर तो यही है कि समस्त संगठन अपने अपने संगठन के लिए सख्त नियम बनावे और सफाई करें। आज से कुछ वर्ष पहले तक विभिन्न जिलों में मैं स्वतः भी केवल एक या दो सन्गठन को ही पत्रकारों के संगठन के रूप में जनता था किंतु तब कुल जितने रजिस्टर्ड पत्रकार हुआ करते थे उससे भी ज्यादा पत्रकार सन्गठन आज खुल चुके हैं।

रास्ते चलते हिस्ट्रीशीटर मिलता है, पूछने पर पता चलता है कि आजकल पत्रकार हैं। सब्जी वाले से ऊंची आवाज में बात करो पता चलता है पत्रकार हैं। टैम्पो वाले से किराया कम करने का अनुरोध करो तो पता चलता है कि साहेब तो वरिष्ठ पत्रकार हैं।

इस विषय पर बहुत मनन की आवश्यकता है। प्राइमरी सन्गठन हर जिले में एक होना चहिये, बाकी सब उसके नीचे होने चाहिए और अगर वे जबरन पैरेलल चलते हैं तो प्रशासकीय दृष्टि से उन्हें कोई तवज्जो नही देनी चाहिए। ऐसा मेरा सुझाव है।

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