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“खेला होबे” - शैलेंद्र श्रीवास्तव

Wednesday, May 5, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi
रचनाकार - शैलेंद्र श्रीवास्तव
प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक


खेला होबे... खेला होबे...!

दीदी ओ... दीदी...!!!

क्या ऐसा ही खेला होना था???

नंदीग्राम की पराजय का

पराजय से उपजे प्रतिशोध का

चुनाव के रक्त चरित्र का

जनता के नर संहार का

वृद्धा माँ की हत्या का

स्त्रियों के बलात्कार का

विपक्षी घरों को होम करने का

सुरक्षाकर्मियों पर प्रहार का

क्या ऐसा ही खेला होना था???

दीदी ओ... दीदी...!!!

बंगाल विजयी हो तुम

बधाई हो...

किन्तु व्यक्तिगत पराजय का

ऐसा प्रतिशोध...!!!

तुम्हारे अपने ही लोग हैं

प्रतिद्वंदी हैं तो क्या हुआ?

लोकतान्त्रिक अधिकार है उनका

कितना दुःखद है...

राजतिलक है तुम्हारा...

और वो पलायन कर रहे हैं

जैसे...

कभी कश्मीर से किया था

हिंसा से, भय से, बलात्कार से 

त्रस्त और भयभीत होकर

दीदी... ओ दीदी...!!!

बंगाल जल रहा है...!!!

स्वनाम की सार्थकता दिखाओ

ममता दिखाओ, करुणा बरसाओ

बंद करो ये विजय ताण्डव

ये विजयोत्सव का उन्माद

अन्यथा...

सब धू...धू... कर जल जाएगा

यदि नहीं बची ममता, करुणा

कुछ शेष नहीं बच पाएगा

दीदी... ओ...दीदी...!!!

चिरौरी है...

अब तो कह दो...

प्रेम होबे... प्रेम होबे...

शान्ति होबे... शान्ति होबे...!

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