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उत्तर प्रदेशके कुछ ऐसे गांव जहाँ कोरोना फटक भी नही पाया आइए जानते है इसके बारे में

Sunday, May 9, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

 इंडेविन न्यूज नेटवर्क

जौनपुर का दुगौली खुर्द, आजमगढ़ का अराजी सेमरी, गाजीपुर का गौरहट और संतकबीरनगर का मुठहींकला गांव। ये चारों गांव नजीर हैं, आत्मसंयम के, अनुशासन के और सजगता के। यही कारण है कि इन गांवों में न कोरोना की पहली लहर घुस सकी और न अब दूसरी। ये गांव इस बात के नजीर हैं कि अपनी जीवनशैली को नियंत्रित रखते हुए थोड़ी सी सावधानी से किसी भी महामारी का मुकाबला किया जा सकता है।

संकट सामने दिखा तो जौनपुर के दुगौली खुर्द गांव के लोग खुद ही सजग हो गए। यह गांव जिला मुख्यालय से 37 किमी दूर है। आबादी है 5300। यहां के 40 फीसद लोग रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं। निवर्तमान प्रधान सुरेश कुमार रजक बताते हैं कि लोग खुद जागरूक हुए।

समय से खाना, सोना, योग-प्राणायाम करने संग सफाई पर ध्यान दिया। शारीरिक दूरी का पालन लोगों की प्राथमिकता में है। बाहर से आने वालों की पहले जांच कराई जाती है। मास्क गांव में किसी के भी चेहरे पर देखा जा सकता है।

अब चलते हैं आजमगढ़ की सगड़ी तहसील के अराजी सेमरी गांव। जिला मुख्यालय से करीब 85 किमी दूर घाघरा नदी किनारे बसे इस गांव की आबादी कुल 350 लोगों की है। केवट जाति की बहुलता है। निवर्तमान ग्राम प्रधान दशरथ निषाद कहते हैं कि गांव में सब जानते हैं कि घर में रहकर ही कोरोना को हरा पाएंगे। किसी को बाजार जाना भी पड़ा तो वह कई और परिवारों का सामान लेकर आता है। हमने अपने खेत की सब्जी, चावल, गेहूं, घाघरा नदी की मछली के सेवन से इम्युनिटी बढ़ाई और कोरोना को गांव में नहीं घुसने दिया।

पूर्वजों से सहज ही मिला ज्ञान : गाजीपुर का गौरहट गांव भी लोगों के लिए मिसाल है। मुख्यालय से 50 किमी दूर गोमती नदी से तीन तरफ से घिरे इस गांव की आबादी 1100 लोगों की है। लेकिन, खुद को कैसे सुरक्षित रखें, यह ज्ञान उन्हें पूर्वजों से सहज ही मिला है। हर साल बाढ़ का कोप झेलने वाले इस गांव के लोग संचारी और संक्रमण की बीमारियों से बचने के लिए नीम की पत्तियों व गोबर के उपलों का धुंआ करते हैं। कोरोना संक्रमण शुरू हुआ तो उनकी दिनचर्या में योग भी शामिल हो गया। इस गांव के योगाचार्य महंत अरुण दास बताते हैैं कि गांव के लोगों ने गोमती किनारे योगाभ्यास और टहलना अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। गांव के हरेंद्र सिंह बताते हैैं कि पिछले साल हमने बाहरी लोगों का प्रवेश रोकने के लिए सड़क पर बैरीकेडिंग कर दी थी।

नीम का दातुन दाल में सिरका, कोरोना पास न फटका : संत कबीरनगर के धनघटा का मुठहींकला गांव आपको सिखाता है कि क्या खाया जाए और कैसे रहा जाए। मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर तीन हजार की आबादी वाले इस गांव के उमापति पांडेय, संतोष शर्मा, रामपति सिंह, धारू सिंह कहते हैैं कि हमने अपनी जीवनशैली नहीं बदली। सभी नीम का दातुन करते हैं। सभी दिन में एक बार नीम की नरम पत्ती जरूर खाते हैं। गर्मी में दाल में कच्चा आम और सिरका डालकर खाते हैं। इससे पित्त नहीं होता। खाना जल्दी पचता है। धनिया की पत्ती खूब खाते हैं, इससे खून पतला रहता है। अदरक और हल्दी कफ नहीं बनने देते। चैनिया (मोटा चावल) ताकत देता है। लहसुन का प्रयोग करते हैं। हल्की-फुल्की परेशानी में गांव भर की अइया (दादी) 85 वर्षीय राधिका देवी का देसी नुस्खा काम आता है। गांव के वैद्य योगेश्वर तिवारी कहते हैैं कि श्रम और परंपरागत खानपान से ही ग्रामीणों की प्रतिरक्षण प्रणाली मजबूत है।

सभी को इससे सीख लेनी चाहिए।

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