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प्लास्टिकासुर - विनीता मिश्रा

Monday, June 21, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रचनाकार - विनीता मिश्र
लखनऊ

हे मानव तुमने 

जब - जब ,

ईश्वर बन अवतार लिया ।

नाश किया कितने असुरों  का 

मानवता  उद्धार किया ।।


मानव ही ईश्वर बनता है 

उद्धार जगत का करता है ।

 

जो  राह  तके अवतारी की 

जग के पालनहारी की  । 

मानव नहीं वो  दानव है ,

भूमिका में अत्याचारी की ।


एक असुर फिर आया  है 

लील रहा जग सारा है ।

क्या गिद्धराज क्या गौ माता !

या नदी समंदर खारा है ।


किसी को भी ना छोड़ रहा 

मीन - गौरैया - पशु - परिंदा !

सबके ऊपर टूट पड़ा 

बन कलयुग का क्रूर दरिंदा ।


ये बड़ा सजीला लगता  है 

पर सबसे हठीला लगता है ।

एक बार जो जन्मे तो 

कोटि  वर्ष तक  रहता है ।


ये सब असुरों का राजा  है

प्लास्टिकासुर  कहाता है ।

ना शस्त्र - काल ही मार सके 

सर्वत्र  सर्वस्व मिटाता  है ।


धरती आज निस्सहाय हुई 

कण - कण उसके घाव भरो ।

हे मानव ! फिर से अवतारी बन कर,

धरती का तुम भार  हरो ।


पाँचो तत्व हुए हैं मैले 

माँ  गऊ  बनी फिर रोती है ।

तू किसकी  बाट है ताक रहा 

मानवता सिसक  कर रोती है ।


इक - इक अलख जगाने  को 

शंकर कौन  बुलायेगा ?

तू  ही शिव है , तू ही विष्णु

तू ही  सृष्टि बचायेगा ।


ये  धरा  हमीं  को  धरती  है 

क्षुधा  भी  सबकी हरती  है ।

क्यूँ  मूढ़  बना तू रे निष्ठुर  !

ये  तुझसे  विनती  करती  है ।


उठ  जाग खड़ा तू अब हो जा !

इक  यज्ञ  का  आवाहन कर ले ।

यही अछूत और  नीच  त्याज्य  है

त्याग   का  इसके  संकल्प  कर ले  ।।

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