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धरती की पुकार - डॉ.रत्ना मानिक

Thursday, June 3, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रचनाकार - डॉ रत्ना मानिक
टेल्को, जमशेदपुर झारखंड - 831004

धरती धरा अवनि पृथ्वी भू वसुंधरा

हर नाम है मेरा प्यारा खुशहाली भरा

पेड़ फूल फल खेत खलिहानों से

निखर आता है रूप मेरा 

मेरा संरक्षण संवर्धन करने वाले

देश के नौनिहालों से ।।

याद है मुझे जब तुमने 

रखा था पहला कदम 

डगमगाते हुए;

भर कर तुम्हें आग़ोश में

हो उठा मन गर्वित मेरा

स्नेहांचल दूर तक लहराते हुए ।।

कितनी सरस कितनी पावन

कितनी निश्छल 

थी प्रकृति तुम्हारी

बरगद नीम या अमराई तले

लगती थीं चौपालें जब

सुनती थी मैं भी 

सुख दुःख की सारी कथा तुम्हारी ।।

उषा बेला में 

खुल जाती थी जब निद्रा मेरी

पनघट पर पनिहारिनों की

नई नवेली दुल्हीनों सुहागिनों की

सुनती थीं बातें रसीली चुलबुली

मन हो उठता था गदगद मेरा 

रहते थे सब 

मिल-जुल कर हसी-खुशी ।।

देख किसानों का परिश्रम अथक

मैं निहाल हो जाती हूँ

पर दीन हीन और दरिद्रता पर उनकी 

सौ-सौ आँसू बहाती हूँ ।।

परिवर्तन प्रगति औ विकास की 

 लहर चली कुछ ऐसी कि

छिन गया आशियाना

 निर्दोष; खग विहग पंक्षियों का

गंदगी के अंबार से

थम गया मचलना नदियों का ।।

पर्वत नदी बाग बगीचों को

तुमने;

 तहस-नहस कर डाला है

मेरी नैसर्गिक सुंदरता को तुमने

विकास के हवन कुंड में

पूर्णतः स्वाहा कर डाला है ।।

कैसा होगा भविष्य तुम्हारा?

सोच कर; कलेजा मुँह को आता है

माँ हूँ तुम्हारी इसलिए ;

संकट में तुम्हें देख सकती नहीं

किन्तु प्रगति की आड़ में

क्रूरता तुम्हारी;

माफ़ मैं कर सकती नहीं

माफ़ मैं कर सकती नहीं....।।

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