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पित्र दिवस पर विशेष- (ममता)- पुष्पा कुमारी "पुष्प"

Saturday, June 19, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

इंडेविन न्यूज नेटवर्क

रचना- पुष्पा कुमारी "पुष्प"
पुणे, महाराष्ट्र

आलू उबालना तो उसके लिए कोई कठिन काम नहीं था और जैसे-तैसे कर आज आटा भी गूंथ ही लिया था उसने।

चैलेंज था!..उबले हुए आलू में नमक-मसाले मिलाकर उसे स्वादिष्ट बना गूंथे हुए आटे में घुसेड़ना!..और उससे भी बड़ा चैलेंज था!..उसे बेलन की सहायता से परफेक्ट गोल आकार देना!!

वो आईटी सेक्टर के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट के बड़ी से बड़ी समस्याओं को चुटकी में सरल करता था,..लेकिन आज अपने 4 वर्ष के बच्चे की फरमाईश पर उसका मनपसंद "आलू का पराठा" बनाना उसके लिए पहाड़ जैसा चैलेंज बना हुआ था,.लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था!

हफ्ते भर होने को आए थे,..फीके "दाल-चावल" के अलावा वह उसे कुछ और बना कर खिला नहीं पाया था,..उसे कुछ और बनाना आता भी तो नहीं था!

कुक रखने की बात तो दूर,..ऐसी गंदी बीमारी ने पांव पसारा था कि झाड़ू-बर्तन करने वाली बाई को भी बाहर से उस सोसाइटी में आने की अनुमति नहीं थी।

वैसे भी जब से ये "कोरोना" नाम वाली बीमारी आई थी तभी से सोसाइटी  के अन्य लोग उससे थोड़ा ज्यादा ही दूरी बनाने लगे थे,..उसकी पत्नी  बैंककर्मी जो थी! (वर्क फ्रॉम होम भी नहीं कर सकती थी) 

और अब तो.. वो "कोरोना पॉजिटिव" भी पाई गई थी।

"टेस्ट" तो बाप-बेटे दोनों का भी हुआ था,..रिपोर्ट "नेगेटिव" आई थी और दोनों "आइसोलेशन" में ही थे।

कोई उनसे मिल नहीं सकता था,..वैसे मिलने भी कौन आने वाला था?

जब से उसकी पत्नी आईसीयू में भर्ती हुई थी "कोरोना" का नाम सुनते ही अजनबी तो दूर उसके अपने भी मानो अजनबी से हो गए थे!

आखिर बच्चे को संभालने के लिए बुलाए तो बुलाए किसे,..कोई रिश्तेदार  यहां तक की उस बच्चे की दादी/नानी भी आने को तैयार नहीं थी।

खैर आज उसने खुद मोर्चा संभाला था और खाना बनाने से पहले एक "मां" की तरह अपने लाड़ले से पूछा था..

"आज मेरा राजा बेटा क्या खाएगा?"

"आलू के पराठे!!"

अपनी मां के वापस लौटने के इंतजार में गुमसुम हो चुके मासूम के मुंह से इतना सुनते ही उसने बिना एक पल गंवाए उसे गोद में उठा,.. सीने से लगा,..उसके माथे को चूम लिया था।

हफ्ते भर से दूध-बिस्किट-ब्रेड पर ही दिन काट रहे मासूम ने आज पहली बार मुस्कुरा कर उससे कुछ फरमाइश की थी। 

"अभी बनाता हूं!!"

उसकी खोई हुई मुस्कान की हल्की झलक अचानक उसके होठों पर देख,.अब वो किसी कीमत पर उस मुस्कान को फिर से खोने को तैयार नहीं था!

चाहे जैसे भी हो,..उसने आलू के पराठे बनाने की ठान ली थी।

ठान तो लिया था!..लेकिन आज पहली बार उस विशिष्ट व्यंजन को बनाने की विधि यूट्यूब पर बार-बार देखने के बावजूद भी उसकी स्थिति भयावह बनी हुई थी।

नमक मसालों के साथ दोस्ती हो जाने के बावजूद आलू,..जैसे-तैसे गूंथे हुए आटे की "हदबंदी" मानने को तैयार नहीं था!..पराठे के गोल आकार लेने से पहले ही वह बार-बार "सीमा-रेखा" लांघ बाहर आ रहा था।

खैर वह भी कहां हार मानने वाला था वह समझ गया था कि आलू "बेलन" को देख घबरा रहा है,..इसलिए आटे की हदबंदी तोड़ बाहर आ रहा है!

अत: उसने बेलन छोड़ अपनी हथेलियों की "प्यार भरी थाप" से ही पराठे को आकार देने का फैसला किया था।

प्यार की हल्की थाप में आलू और आटे को उलझा उसने अंतत: अपने हाथों से पहले पराठे को गोल आकार दे ही दिया था।

उसने महसूस किया गर्म तवे पर खुशबू फैलाता घी के संग सिंकते पराठे की रंगत के साथ-साथ उसके भीतर भी कुछ बदल रहा था।

उधर कई दिनों से बमुश्किल कुछ कौर ही खाने वाला मासूम घर में फैली अपनी पसंदीदा जानी-पहचानी खुशबू में सराबोर हो रसोई तक पहुंच अचानक बोल उठा था….

"पापा जल्दी दो!!..भूख लगी है!!"

उसने लपक कर बेटे को गोद में उठा लिया था और अच्छी तरह सिंक चुका इकलौता पराठा तवे से उतार,..वही पड़ी तश्तरी में डाल सीधे डायनिंग टेबल पर आ गया था।

उस गर्म पराठे को एक किनारे से तोड़,..अपने होठों से फूंक कर उसे ठंडा किया था..और अपने बच्चे का पहला मनपसंद निवाला उसके मुंह में डालते ही उसकी आंखें खुद-ब-खुद छलक पड़ी थी।

बड़े दिनों बाद बच्चे ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिला एक खास इशारा जो किया था।

"टेस्टी"!! 

बेशक उस वक्त उसके शरीर के भीतर "कोख" जैसी कोई संरचना नहीं उभरी होगी!.. किंतु आज उस नन्हीं सी जान को अपने हाथों से बनाकर उसका कुछ मनपसंद खिलाते हुए उसकी अंतरात्मा "मां" जैसी #ममता से भर उठी थी।

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