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अबोध प्रश्न - रूपा पाण्डेय सतरूपा

Thursday, July 29, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

रचनाकार - रूपा पाण्डेय "सतरूपा"
लखनऊ

इक दिन मैंने माँ से पूछा 

गोदी में सिर रख के 

माँ ! तू क्यूँ गुमसुम रहती है, 

रोती है छुप छुप के ...

क्यूँ तेरे इस मुखमंडल की 

कांति हो गयी धुंधली ,

क्यूँ तेरी चोटी रहती है 

हरदम उथली पुथली ..

क्या तेरा अनमोल खिलौना 

कोई टूट गया है ,

या फिर कोई सच्चा साथी 

तुझसे रूठ गया है ...

मेर संग जब ऐसा होता 

तब मैं रोया करती  ,

फिर बाबा से नया मंगाकर 

उससे खेला करती ....

ओरी माँ ! कुछ सुनती है क्या 

तुझसे पूछ रही हूँ ,

देख उदासी तेरी  

भीतर- भीतर  टूट रही हूँ ...

कुछ न बोली ! 

रही देखती वह अपलक सी मुझको ,

पर उसकी आँखें कहती थीं 

क्या बतलायें तुझको ...

उम्र थी छोटी  प्रश्न गूढ़ थे 

उत्तर समझ न पायी ,

और माँ की कोमल थपकी पा 

मुझको निंदिया आई ...!!!!!!!!

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