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कितना लिखूं प्रेम पर - सीमा मोटवानी

Friday, July 30, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi
रचनाकार - सीमा मोटवानी
फैज़ाबाद


कितना लिखूं प्रेम पर ,,

सोच कर हूँ दंग प्रिये!!!

ये कौन सी रहस्यमयी नगरी है,

राह जिसकी सकरी है,

आने के सौ-सौ द्वार खुले,

जाने की न कोई डगरी है।


ये कैसी भूल भुलैया है!

बिन पतवारी नैया है,

यहाँ प्रश्नों के समंदर हैं ,

पहेलियों के बवंडर हैं,

मन बूझे तो मन खोये, 

न बूझे तो हम खोये।


प्रेम कैसी परिभाषा प्रिये!

न संदर्भ है न व्याख्या प्रिये

शब्दों में कई कई मौन छिपे,,

मौन ने कई कई अर्थ लिये।

कितना लिखूं प्रेम पर,, 

सोच कर हूँ दंग प्रिये !!!!

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