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वो था कितना रूमानी! - कुसुम सिंह लता

Friday, July 9, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

लेखिका - कुसुम सिंह लता
नई दिल्ली

मन्द - मन्द  मृदु  मुस्कान,

थी खेल रही उसके अधर,

एक अलौकिक - सा तेज़,

था  अतीव मुखपर मुखर!


गुनगुनी  धूप - सी तपिस,

शीतल समीर सी खलिस,

हाँ! वो   खिलता   कमल,

निश्चय था तेजस्वी विमल!


अलसाये   अनुपम   विलोचन,

जैसे अभी देखा हो स्वप्न सुंदर,

सज  रहे  थे  उसके  भाल पर,

बेतरतीब   बिखरे - से  चिकुर!


बदन पर लिपटा वस्त्र आसमानी,

नायक   हो   कोई  सुंदर  कहानी,

अति   सरल   मृदु  उसकी  वाणी,

सचमुच  था  वो  कितना रूमानी!

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