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प्रारब्ध की गति - पूजा खत्री

Saturday, July 10, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi

  

लेखिका - पूजा खत्री
लखनऊ

"एक सड़क पर बड़ी तेज धूप थी।  उस पर एक बैलगाड़ी अपनी मन्द गति से चली जा रही थी  गाड़ी पर बहुत सा बोझा लदा हुआ था। गाड़ीवान भी मस्त गाड़ी पर छाया करके आराम कर रहा था | सुनसान सड़क पर कहीं से एक कुत्ता आ गया।  वह भी उसी ओर जा रहा था जिधर को गाड़ी जा रही थी। कुत्ते को जब तेज धूप लगने लगी तो सोचा कि कैसे धूप की गर्मी से बचा जाय। तो कुत्ते ने सोचा कि इसी बैलगाड़ी के नीचे हो जांय तो धूप न लगेगी।

      कुत्ता बैलगाड़ी के नीचे हो गया। अब बैलगाड़ी अपनी गति से जा रही थी। कुत्ता भी उसी गति से गाड़ी के नीचे नीचे उसकी छाया में जा रहा था। कुछ देर तक इसी प्रकार चलते चलते कुत्ते को लगने लगा कि वह खुद पूरी बैलगाड़ी को अपने ऊपर लिए हुए है। वह खुद पूरा बोझ उठाये हुये है। वह खुद सारे बोझ के साथ चल रहा है वह खुद बोझ से दबा जा रहा है।

      जब इस प्रकार की भावना के वशीभूत कुत्ता चल रहा था तभी वह बैल के पैरों के निकट पहुँच गया। बैल ने जो एक लात मरी तो कुत्ता छटक कर दूर जा गिरा। पें पें चिल्लाने लगा। तब उसने देखा कि गाड़ी तो अब भी चली जा रही है। तब उसके समझ में आया कि इस गाड़ी को चलाने वाला कोई और है। गाड़ी को खींचने वाला कोई और है।  वह स्वयं जा रही है। उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर मैं चुपचाप उसकी छाया में चलता जाता तो ये बैल भी मुझे न मारते और धूप भी रस्ते में न लगती

             "इसी प्रकार, संसार की बैलगाड़ी अपनी गति से चली जा रही है। इसे चलाने वाला कोई और है | बोझ भी किसी दूसरे को खींचना है  हमें तो गाड़ी के नीचे छाया में हर कष्ट से बचते हुये चलते रहना चाहिये। वह प्रारब्ध इन सबके लिए उत्तरदायी है। हम नाहक अपने को कर्ता-धर्ता समझ रहे हैं। काल जब लात मार कर हमें चेताता है तब हम सत्यता को समझ पाते हैं। इसलिए वास्तव में इस संसार में निस्पृह बन कर रहना चाहिए। प्रारब्ध स्वयं सब करता रहता है  और हम स्वयं को कर्ता मानकर नाहक अहम में भरे बैठे हैं ... ‌



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