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ज़िंदगी बाँसुरी की तरह बज उठी - शीतल वाजपेयी

Friday, July 9, 2021

/ by Dr Pradeep Dwivedi
लेखिका - शीतल वाजपेयी
कानपुर


प्रेम के लग्न की पत्रिका हो गये।

नेह पंचाँग की साधिका हो गये।

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इस तरह रँग गये नेह के रंग में,

एक दिन कृष्ण भी राधिका हो गये।

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ज़िंदगी बाँसुरी की तरह बज उठी,

सुर सधे और हम गायिका हो गये।

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मौन था चित्र मेरा मुखर हो गया,

नैन प्रियतम के जब तूलिका हो गये।

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रीति की बेड़ियाँ टूट कर गिर गयीं,

तुम हुये शुक तो हम सारिका हो गये।

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दीप विश्वास का ज़िंदगी भर जले,

बस इसी आस में वर्तिका हो गये।

.

श्वेत पृष्ठों पे जब चल पड़ी लेखनी

शब्द यों मिल गये गीतिका हो गये।

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