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लखीमपुर खीरी: आशीष की जमानत के खिलाफ अपील पर SC में 11 को होगी सुनवाई

लखीमपुर खीरी।

उच्चतम न्यायालय लखीमपुर खीरी 'हत्याकांड' के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से मिली जमानत रद्द करने की मांग वाली याचिका पर 11 मार्च को सुनवाई करेगा।

शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय खंडपीठ की अध्यक्षता कर रहे मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन ने शुक्रवार को वरिष्‍ठ वकील प्रशांत भूषण के 'विशेष उल्लेख' पर कहा कि वह इस अपील पर 11 मार्च को सुनवाई कर सकते हैं। प्रशांत भूषण ने इस मामले को अत्यावश्यक बताते हुए खंडपीठ के समक्ष शीघ्र सुनवाई की गुहार लगाई थी।

मृतक किसानों के परिजनों का नेतृत्व कर रहे जगजीत सिंह की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने फरवरी में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा आशीष को जमानत दिए जाने को कानूनी प्रक्रिया और अन्याय की अनदेखी करार दिया है। इससे पहले, अधिवक्ता सी एस पांडा और शिव कुमार त्रिपाठी ने भी केंद्रीय राज्य मंत्री के पुत्र की जमानत के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।

किसानों के परिजनों की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय ने 10 फरवरी के अपने आदेश में आशीष को जमानत देने में  "अनुचित और मनमाने ढंग से विवेक का प्रयोग" किया।

किसानों के परिजनों की याचिका में दावा किया गया है कि उन्हें कई आवश्यक दस्तावेज उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाने से रोका गया था।  याचिकाकर्ता का कहना है कि उनके वकील को 18 जनवरी 2022 को वर्चुअल सुनवाई से तकनीकी कारणों से 'डि‍स्‍कनेक्ट' कर दिया गया था और इस संबंध में अदालत के कर्मचारियों को बार-बार कॉल कर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कॉल कनेक्ट नहीं हो पाया था। इस तरह से मृतक किसानों के परिजनों की याचिका प्रभावी सुनवाई किए बिना खारिज कर दी गई थी।

जगजीत सिंह के नेतृत्व में दायर याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने की वजहों में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आशीष की जमानत के खिलाफ अपील दायर नहीं करना भी शामिल है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश में उसी दल की सरकार है, जिस दल की सरकार में आरोपी आशीष के पिता अजय मिश्रा मंत्री हैं। याचिका में कहा गया है कि शायद इसी वजह से राज्य सरकार ने आशीष की जमानत के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दायर नहीं की। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उच्च न्यायालय अपराध की जघन्य प्रकृति पर विचार करने में विफल रहा। उनका कहना है कि गवाहों के संदर्भ में आरोपी की स्थिति उसके न्याय से भागने, अपराध को दोहराने, गवाहों के साथ छेड़छाड़ और न्याय के रास्ते में बाधा डालने की संभावनाओं से भरा पड़ा है। 

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